Thursday, June 3, 2010
अनजान मोड़ .........
क्यों नहीं समझते हैं वो कि हम किस राह में खड़े हैं,
जहाँ चारों तरफ सिर्फ घूरती निगाहों का हुजूम है।
दिल में हमारे हसरतों का अथाह सागर है,
पर इन्हें पूरा करना शायद अब हमारा मुकद्दर नहीं है।
जहाँ हम दोनों के रिश्ते के बीच एक लम्बी दीवार है,
जिसके उस पार देखना शायद अब मुमकिन नहीं है।
बार बार वही प्रश्न क्यों सामने आकर खड़े हो जाते हैं,
जिनके जवाब हाँ होकर भी सदा न पर खत्म होते हैं।
फिर भी वो वही बातें बार बार क्यों किया करते हैं,
जिनके उत्तर हमें बार बार परेशां किया करते हैं।
खुद खुदा जानता है कि हमारी वफ़ादारी क्या है,
पर उन्हें तो बेवफा कह कर रुलाने में मज़ा आता है।
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