Tuesday, May 25, 2010

फिर भी .......

हर तरफ आज आदमी रिश्तों से घिरा बैठा है,
फिर भी भीड़ में अकेला सा क्यों है।
हर तरफ आज फिजाओं में रौशनी सी है,
फिर भी धुंद सा घना धुआं क्यों है।
हर तरफ खुशियों की बहारें ही बहारें हैं,
फिर भी दिल आज उदास उदास सा क्यों है।
हर तरफ आज पूर्णिमा की चांदनी सी है,
फिर भी दिल में अमावस सा अँधेरा क्यों है।
हर तरफ फुहारें आने को लगती है,
फिर भी मौसम तीव्र ग्रीष्म सा क्यों है।
हर तरफ हरियाली ही हरियाली है,
फिर भी यहाँ सूखा सूखा सा क्यों है।
हर तरफ हम मुस्कुराने के बहाने ढूँढ़ते है,
फिर भी दिल में दर्द दबा दबा सा क्यों है।
हर तरफ प्यार की छठा बिखेरतें है,
फिर भी दिल प्यार को तरसता क्यों है।
हर तरफ प्यार और दुआओं का मजमा लगा है,
फिर भी खुदा की बंदगी क्यों दिखती नहीं है।

1 comment:

  1. कुछ शेर बहुत बढ़िया हैं क्योंकि दिल की गहराई से निकले हैं जैसे
    हर तरफ हम मुस्कुराने के बहाने ढूँढ़ते है,
    फिर भी दिल में दर्द दबा दबा सा क्यों है।

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