Saturday, October 30, 2010




मेरी ज़िन्दगी में अँधेरे नहीं हैं कुछ कम , फिर क्यों इस जलते चिराग को बुझा रहे हो ?

हँसने का दिखावा तो हम करते है लाखों बार , फिर क्यों इस इक मुस्कराहट को चेहरे से हटा रहे हो ?
.
हुजूम सा दिखता है यूँ तो चाहने वालों का चारों और , फिर क्यों अपने होकर भी गेर से लग रहे हो ?

क्या है मेरा तुम्हारा रिश्ता नहीं जानती हूँ कुछ भी , फिर क्यों बार बार इन रिश्तों का इज़हार करा रहे हो?

दो कदम साथ चलने की सिर्फ की थी तमन्ना, फिर क्यों बीच राह में छोड़ के जा रहे हो?

नहीं हूँ तेरे प्यार के काबिल पता है मुझे ऐ दोस्त, फिर क्यों इस दोस्ती को आगे बड़ा रहे हो ?

नफरत भी करना चाहो न कर सकोगे मुझसे, फिर क्यों दिल में अपने नफरत जगा रहे हो ?

खुश रहे तू सदा बस यही इल्तिजा है , फिर क्यों बेवाज़ा खुद को ग़मों में डूबा रहे हो ?