Tuesday, May 25, 2010

फिर भी .......

हर तरफ आज आदमी रिश्तों से घिरा बैठा है,
फिर भी भीड़ में अकेला सा क्यों है।
हर तरफ आज फिजाओं में रौशनी सी है,
फिर भी धुंद सा घना धुआं क्यों है।
हर तरफ खुशियों की बहारें ही बहारें हैं,
फिर भी दिल आज उदास उदास सा क्यों है।
हर तरफ आज पूर्णिमा की चांदनी सी है,
फिर भी दिल में अमावस सा अँधेरा क्यों है।
हर तरफ फुहारें आने को लगती है,
फिर भी मौसम तीव्र ग्रीष्म सा क्यों है।
हर तरफ हरियाली ही हरियाली है,
फिर भी यहाँ सूखा सूखा सा क्यों है।
हर तरफ हम मुस्कुराने के बहाने ढूँढ़ते है,
फिर भी दिल में दर्द दबा दबा सा क्यों है।
हर तरफ प्यार की छठा बिखेरतें है,
फिर भी दिल प्यार को तरसता क्यों है।
हर तरफ प्यार और दुआओं का मजमा लगा है,
फिर भी खुदा की बंदगी क्यों दिखती नहीं है।

Thursday, May 20, 2010

रास्ता

ये किन रास्तों पर चल पड़े हैं हम, खुद नहीं जानते हैं
न पता न है ठिकाना किस रह पर चल पड़े हैं।

उन अनजान उबड़ खाबड़ रास्तों की राह में कोई है
जहाँ जब भी हम गिरते हैं कोई आकर संभाल लेता है।

दिल में प्यार का बेशकीमती खज़ाना लेकर निकल पड़े हैं
जिसे किसी के लूटने या लुटवाने का भी डर नहीं है।

इन रास्तों में चलते हुए किसी से तकरार भी बहुत होती है
पर उतनी ही इसमें प्यार की उम्र भी बड़ी होती है।

चलते चलते ख्यालों में न जाने क्या क्या बातें करते हैं
पर किसी की एक आवाज़ सुनकर सब कुछ भूल जाते हैं।

पता नहीं वह क्या है जो पहुँच से बहुत दूर है
पर लगता है जैसे दिल के बहुत करीब है।

यह सोच की उड़ान मेरे ख्वाबों में अक्सर दस्तक देती है
ये क्या है जो रूह को रूह से एक किया करती है।

यह रास्ते क्यों कर इतने लम्बे लम्बे से हैं
जहाँ निरंतर चलते हुए भी सफ़र खत्म होता नहीं है।

नहीं है इन रास्तों में फिर भी क्यों कर ऐसा लगता है
जैसे कोई हमदम-हमसफ़र साथ साथ चल रहा है।

चलते चलते अचानक एक अनकहा अनछुआ एहसास हुआ है
जहाँ खट्टी मीठी बातों की एक प्यारी सी कसक है।







Wednesday, May 19, 2010

जब भी देखा जहाँ भी देखा ......

जब भी देखा, जहाँ भी देखा
बस तू ही तू नज़र है आया।


बंद पलकों में, दुआ में अपनी
बस तुझे ही सामने है पाया।


कितना प्यारा, ये पावन सा
रब ने ये रिश्ता है बनाया।


न कोई मंजिल न है ठिकाना
वक्त ने फिर भी, हमें है मिलाया।


उन मोड़ों पर, जो बहुत कठिन थे
हर उस मोड़ पर, तुझे मैंने है पाया।


गिर के संभालना, और फिर उठाना
आपने ही हमें, हरदम है सिखाया।


कैसे करना, सपनो को है पूरा
वक्त वक्त पर आपने हमें है सिखाया।


जब रास्ते पर, चलना था मुश्किल
तब सही रास्ता आपने हमें है दिखाया।


हमसे अपना ही भरोसा, जब टूट रहा था
तब आगे बढकर, हमारा हौसला है बढाया।


निराशा के समंदर में, डूबे थे जब हम
साहिल बनकर, किनारा हमें है दिखाया।


जब हो रहे थे, खुशियों से परे हम
बात बात पर हँसना हमें है सिखाया।


जब भी दुःख तकलीफों ने हमें सताया
हरदम हमसफ़र, तुझे साथ है पाया।


नज़र न लगे, हमारे इस रिश्ते को
जिसे हमने विश्वास की डोर से है पिरोया।


बस यही अब इक इल्तिजा है हमारी
ये साथ यूँ ही रहे सदा, ऐ खुदाया।

Wednesday, May 12, 2010

दोस्त



ऐ दोस्त तेरी दोस्ती का रिश्ता बहुत गहरा है
न जाने किस उम्मीद पर दिल ठहरा है।


ऐ दोस्त यह रूह से रूह की गहराईयों का रिश्ता है
जो रिश्तों से परे मोहब्बत की डोर से बंधा है।


ऐ दोस्त यह एक प्यारा सा मासूमियत का रिश्ता है
जिसमे रूठकर मनाने का एक सिलसिला है।


ऐ दोस्त यह पाक इरादों का रिश्ता है
जिसमे दिल हर वक्त तेरी खुशियों की दुआ करता है।


ऐ दोस्त यह एक गुमनाम सा रिश्ता है
जो लोगों की रुस्वायिओं से डरता है।


ऐ दोस्त यह तेरा नहीं न ही मेरा रिश्ता है
यह तो उस खुदा का प्यारा सा रिश्ता है।


ऐ दोस्त यह दूरियों और फासलों से परे का रिश्ता है
जिसमे हरदम तू ही तू मेरे पास हुआ करता है।


ऐ दोस्त यह उन ख्वाहिशों और तमन्नाओं का रिश्ता है
जिसमे दिल हर वक्त तुझसे मिलने की दुआ करता है।


ऐ दोस्त यह ख्यालों में खुदा को पाने का रिश्ता है
क्योंकि खुद खुदा ही तुझमे दिखता है।