Wednesday, March 24, 2010

अहसास

रिश्तों का महफूज़ होना
और उनका कायम होना
कितना अजीब सा था.

मोहब्बत का अक्स होना
और उसका गायब होना
कितना बेबुनियादी सा था.

अफ्सानों का बड़े होना
और कभी न खत्म होना
कितना मुश्किल सा था.

फिकरों का हावी होना
और जल्दी न रुखसत होना
कितना खलबली सा था.

gham का हरदम साथ होना
और रूककर कुछ चलने का होना
कितना हकीकत सा था.

गिरकर फिर उठने का होना
और ग़मों से घायल होना
कितना हमदम सा था.

ज़िन्दगी में सुख-दुःख का होना
और फिर भी ज़िन्दगी का होना
कितना पहचाना सा था.

मिलकर करीब सा होना
और फिर बिछड़ने का होना
कितना दुखदाई सा था.

नामों का हरदम गुम होना
और उन्ही का रौशन होना
कितना खाली-खाली सा था.

मिसालों का सामने होना
और हकीकत में कायम होना
कितना अंतर-अंतर सा था.

इंसानियत का खत्म होना
और क्रूरता का साबित होना
कितना व्हेशियतपन सा था.

परछाइयों का साँथ होना
और पकढ़ का दूभर होना
कितना वाजिब सा था.

मोहब्बत का ज़िन्दगी में होना
और भावना का महफूज़ होना
कितना अहसास प्यारा सा था.

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