"अश्क "
जो तूफानों के थपेड़ों से, कूच करता हुआ किनारों का पता पूछता है
तमाम रंजिशें वो तमाम तकलीफें, गुम हो जाती हैं
इक तरश्शो बन जाती हैं, उन हसीं पलों को महफूज़ करके
जिनसे तहारुख हुआ था इक दिन
उन पलों को महफूज़ करना, आज भी मुझे वो सब दे जाता है
जो अक्सर वो तमाम तकलीफें - रंजिशें, मुझसे छीनकर फनाह हो गई हैं.
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