Tuesday, March 23, 2010

मेरी अभिव्यक्ति 'अश्क'

महिला दिवस
आज है महिला दिवस, आज है महिला दिवस
इस दिन को यूँ ही नहीं गवाना है
करो प्रतिज्ञा आज ये, हमको कुछ कर दिखलाना है
स्वयं बढकर इस देश को आगे बढ़ाना है
हर क्षेत्र में नए झंडे गढ़ाना है.

जन्म लिया है, जन्म दिया है
इस दुनिया को इक नया मुकाम दिया है
तुझे सूर्य की तरह तेजस्वी बनकर
चहुँ और अपना तेज फैलाना है
चन्द्रमा की तरह शीतल बनकर
शांति की लौ को जलाना है
तारों की तरह दीप्तीमान होकर
चंहूँ और अपना यश बिखराना है
फूलों की तरह महक महक कर
खुशियों के रंग फैलाना है

नारी तुम अबला नहीं सबला हो
तुम शिक्षित हो तो जग शिक्षित है
तुम इस मशाल को यूँ ही जलाये रखना
और अपना वर्चस्व बनाये रखना
भूलना नहीं की तुम इक नारी हो
जो सृष्टि-रचना की अधिकारी है
तुम इक माँ, बहन, पत्नी और प्रेमिका हो
उससे बढ़कर तुम ममता-करुना और प्रेम का दरिया हो.

क्यों फिर आज इस नारी रूपी विरासत को,
हम अपने ही हांथों नष्ट कर रहे हैं
इसकी अवहेलना,-बलात्कार और भ्रूण हत्या कर रहे हैं
पूछती हूँ आज मैं इन देश के ठेकेदारों से
क्यों घट रहा है आज इनका अनुपात पुरुषों से
स्वयं हमें ही रोकना होगा, आज इसे बचाना होगा
भविष्य के लिए आज इसे सहेजना होगा
चलो आज मिलकर लेते हैं ये शपथ
खुद को खुद से बचाकर बनायेंगे एक नया पथ.

अनुराधा 'अश्क'

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