Thursday, May 20, 2010

रास्ता

ये किन रास्तों पर चल पड़े हैं हम, खुद नहीं जानते हैं
न पता न है ठिकाना किस रह पर चल पड़े हैं।

उन अनजान उबड़ खाबड़ रास्तों की राह में कोई है
जहाँ जब भी हम गिरते हैं कोई आकर संभाल लेता है।

दिल में प्यार का बेशकीमती खज़ाना लेकर निकल पड़े हैं
जिसे किसी के लूटने या लुटवाने का भी डर नहीं है।

इन रास्तों में चलते हुए किसी से तकरार भी बहुत होती है
पर उतनी ही इसमें प्यार की उम्र भी बड़ी होती है।

चलते चलते ख्यालों में न जाने क्या क्या बातें करते हैं
पर किसी की एक आवाज़ सुनकर सब कुछ भूल जाते हैं।

पता नहीं वह क्या है जो पहुँच से बहुत दूर है
पर लगता है जैसे दिल के बहुत करीब है।

यह सोच की उड़ान मेरे ख्वाबों में अक्सर दस्तक देती है
ये क्या है जो रूह को रूह से एक किया करती है।

यह रास्ते क्यों कर इतने लम्बे लम्बे से हैं
जहाँ निरंतर चलते हुए भी सफ़र खत्म होता नहीं है।

नहीं है इन रास्तों में फिर भी क्यों कर ऐसा लगता है
जैसे कोई हमदम-हमसफ़र साथ साथ चल रहा है।

चलते चलते अचानक एक अनकहा अनछुआ एहसास हुआ है
जहाँ खट्टी मीठी बातों की एक प्यारी सी कसक है।







3 comments:

  1. priye rajeev apka bahut bahut shukriya, yadi aap jaise log hame yun hi protsahit karte rahenge to hame aur likhne ki prerna milegi.

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  2. दिल में प्यार का बेशकीमती खज़ाना लेकर निकल पड़े हैं
    जिसे किसी के लूटने या लुटवाने का भी डर नहीं है...
    इस बात में मुझे ख़ास बात लगी, बढ़िया तरीके से आपने बयां किया है.

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